कभी कभी हम कितने लाचार से हो जातें हैं जब कभी ऐसी निर्णय की घडी आ जाती है जब एक तरफ अपना हित होता है और दूसरी तरफ अपनों का I खुद पीछे नहीं हटना चाहते तो मेरे अपने रुसवा हो जातें है ऐसे में एक हीं विकल्प होता है या खुद से बगावत कर लें या अपनों को रुसवा कर दें .............
लेकिन दोस्त सपनों की कीमत अपनों से ज्यादा तो नहीं होती तो फिर खुद से हीं बगावत कर लीजिए और अपनों को मायूस होने से बचा लीजिए यकीन कीजिए उन्हें भी आपका ख्याल जरुर आएगा जिनके लिए आप खुद से बगावत करने जा रहें है
हर बात पे जिद करते हो ,
हर बात पे हठ करते हो ,
इतना मुहब्बत कयूं खुद से ,
कभी दूसरों की सुन लीजिए
चाहे खुद से बगावत कीजिए
रं ..जित
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मेरे कलम से
