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दिल अगर कांच का होता तो चूर चूर कर देते
मेरे अश्कों को हम अपने जहाँ से दूर कर देते
तड़प इतनी न होती इस मायूस जहाँ से
खुदा तु मेरा दिल भी अगर पत्थर का कर देता
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ना जाने क्या ढूढतें हैं ,कहाँ तक आ गएँ हैं
मुड़कर अपने पैरों के निशाँ ढूढतें हैं
जिन्दगी हसने मुस्कुराने का फलसफा है बस
कभी तन्हाई तो कभी कारवां ढूढतें हैं
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रहेंगे और हम बेजान से दुनियां में कब तक,
करेंगे हम और झूठी ऐतबार कब तक
हमें दुनिया से क्या तुमसे सिकायत है मौला
लोगे और मेरे सब्र का इम्तहान कब तक
करके रौसनी सरे जहाँ को देखते हो
सभी से है मुहब्बत तो हम से दूर कुन हो
तरस अति नहीं तुमको हमरी इल्तजा पर
बुला लो मुझको भी तुम पास जिस दुनियां में तुम हो